Introduction

हरि अनन्त हरि कथा अनंता।

कहहिं सुनहिं बहुविधि सब संता।।

हरि अनन्त हैं, उन का पार कोई भी नहीं पा सकता; और उनकी कथा भी अनंत काल से ही कही –  सुनी जा रही है। रामायण विश्व में अनेक रूप में, अनेक भाषाओं में लिखी गई है और अनादि काल से संत लोग इसे कहते सुनते आए हैं। रामायण हर रुप में, हर भाषा में आदरणीय है, मोक्षदायिनी है, और जन जन के लिए स्वाध्याय का मार्ग है।

पद्म़पुराण पर आधारित, इस काव्यगाथा “सरल जैन रामायण”  को,  विश्व भर में बुंदेलखंडी भाषा की प्रथम और एकमात्र राम चरित आधारित रचना होने का गौरव प्राप्त है। इस के रचयिता ब्रह्मचारी कस्तूरचंद नायक जी ने इस ग्रंथ की रचना इसी उद्देश्य से  सरल भाषा में की जिस से रामायण का अनुसरण जन साधारण द्वारा आसानी से किया जा सके।

          ग्रंथकार ब्रह्मचारी कस्तूरचंद नायक जी, मेरे बाबा श्वसुर,  संस्कारधानी जबलपुर वासी, न तो कोई साहित्यकार थे न ही कोई प्रसिद्ध कवि। बुंदेलखंडी भाषा बोलने वाले , अध्यात्म में रुचि रखने वाले साधारण पुरुष थे। वे समझते थे कि गूढ़ बातों को समझाने के लिए उन का सरल भाषा में लिपीबद्ध होना आवश्यक है। इसीलिए सरल भाषा में रामायण लिखने का निश्चय किया। अपने गुरु , आत्मोद्धारक १०५ क्षल्लुक श्री गणेश प्रसाद जी वर्णी महाराज की प्रेरणा से, सात साल के अथक परिश्रम से, काव्यांजलि “सरल जैन रामायण”  की रचना करी। सन १९५० में लिखी उनकी यह सरस और भावपूर्ण प्रस्तुति जन समुदाय द्वारा बहुत सराही गई। इसे पढ़ने वाले व  सुनने वाले सभी एक मत थे कि समाज के लिए इस कल्याणकारी ग्रंथ का प्रचार – प्रसार घर घर हो। परिणाम स्वरूप इस रामायण का पठन-पाठन हर घर में होने लगा और नायक जी को व्याख्यानों के लिए धार्मिक अनुष्ठानों व सम्मेलनों में बुलाया जाने लगा।

कालांतर में, उनके देहावसान के पश्चात, क्रमशः क्रमशः यह अमूल्य धरोहर विस्मृत कर दी गई और विलुप्त होने की कगार पर पहुंच गई। और यह अद्वितीय कृति केवल जैन मंदिरों में सिमट कर रह गई।                           

यह सत्य है कि परिवर्तन संसार का नियम है; परन्तु अपनी धरोहर को संजोकर रखने की कोशिश भी हमें ही करनी है।इसी उद्देश्य से सरल जैन रामायण के संक्षिप्त संस्करण का पुनः प्रकाशन सन् २०१३ में किया गया; जो कि यू ट्यूब पर भी उपलब्ध है। पाठक गण द्वारा इसे बहुत सराहा गया। आज के पाठक के लिए पुस्तक की अपेक्षा  इंटरनेट द्वारा  ज्ञान अर्जित करना अधिक सुलभ है। इस कारण हमारा यह प्रयास है कि हम इंटरनेट के माध्यम से, इस अनमोल, कल्याणकारी  कृति को ई – बुक ( e – book) के द्वारा  पुनः जन साधारण को उपलब्ध करा सकें।

हमारी यह छोटी सी चेष्टा न केवल जैन समाज की बल्कि भारतीय संस्कृति की भी,पूरे विश्व में कीर्ति फैलाने का एक प्रयास है। आप सभी पाठक गण से कर बद्ध अनुरोध है कि आप इस अद्वितीय रचना का रसास्वादन अवश्य करें।

“सरल जैन रामायण” की पुनः प्रस्तुति के लिए मैं साभार नमन करती हूं इंजीनियर श्री कोमल चंद जैन जी का, जिनके सहयोग एवं मार्ग दर्शन के बिना यह कार्य संभव ही नहीं था। उनकी सहायता से ही आज मैं अपने परम पूज्य श्वसुर जी , स्व. डॉ मंगल चंद नायक जी का यह स्वप्न पूरा कर पायी हूं।

मैं सदैव आभारी रहूंगी अपने पतिदेव, डॉ. डैनी नायक जी की,जो हर कदम पर मुझे प्रोत्साहित करते रहे। कंम्पयूटर विशेषज्ञ श्री संतोष मिश्रा जी एवं अपनी बहन श्रीमती  इंदिरा ‌श्रीवास्तव  जी, के अमूल्य सहयोग के लिए भी मैं सदैव कृतज्ञ रहूंगी। अपने इस छोटे से प्रयास को मैं समर्पित करती हूं अपनी भावी पीढ़ी को — प्रिय स्पर्श, ऋचा, तृषा, श्री हर्षा एवं प्यारी सी अनायशा  को और समस्त नायक परिवार को।

विनीत

डॉ. स्वराज नायक

स्त्री रोग विशेषज्ञ,

नायक नर्सिंग होम,

जबलपुर (मध्य प्रदेश)

Email : drswarajnaik@gmail.com